इंसान बहुत समझदार हैं उतना ही मतलबी भी..., हो सकता है आपको लगे कि मै पूर्वाग्रह से ग्रसित हुं पर यही सच है ।
हमे अपने इतिहास में ये गलत पढ़ाया जाता है कि इंसानों ने आज से कई सौ साल पहले फसल उगाना सीखा ,ये उतना ही गलत है जितना कि हम इंसान अपने आप के वर्चस्व के लिए सोचते है ।
सच तो ये है कि हमने प्रकृति प्रदत्त उपहारों को सिर्फ अपने लिए उगाना शुरू किया ,सिर्फ अपने लिए बचाना शुरू किया ।
हमने जंगलों से अपने जरूरत के फलों सब्जियों ,पौधों को चुन चुन कर निकालना शुरू किया , शुरू में हम जितना जरूरत होता था उतना ही लेते थे पर समय के साथ हम पूरे फसल के सभी रूपों को लेकर अपने लिए सिर्फ अपने लिए उगाना शुरू किया ।
हम ये भूल गए या परवाह नहीं किए ??🤔
हमने उन पशु पक्षियों ,कीड़े ,मकोड़े जो अहसहाय होकर रह गए उनके बारे में कभी नहीं सोचा उनको सिर्फ कुछ सीमित संसाधनों और घास फूस के बदौलत छोड़ दिए ।
उनको भी मन होता होगा इन स्वादिष्ट पौधों को खाने के लिए इसलिए तो आ जाते है हमारे खेत , गार्डन या सब्जियों के खेत में खाने के लिए ।।
एक इंसान या कहे हर इंसान यही करता है कि उसे पत्थर , डंडों से मारकर भागता है, यहां तक की उसे लहूलुहान होते तक मारता है।
बड़े गर्व से कहता है कि मैंने लगाया, मेरा फसल है, जबकि ये तो उनका भी हिस्सा है था और रहेगा ।
क्या एक इंसान के नाते ये हमारी दायित्व नहीं है कि हम मतलबी ना बने ।
"दुख होता है जब बड़े गर्व के साथ इसे बताया जाता है कि इंसानों ने इसे कृत्रिम चयन से अपनाया है ।""
प्रकृति में सभी का हिस्सा है, इंसान सिर्फ अपने लिए क्यूं सोचता हैं, सच में वो आदिवासी ही श्रेष्ठ हैं जो प्रकृति से उतना ही लेता है जितना जरूरत है ।
यकीनन आज सबसे मतलबी इंसान ही है ।
इस पर मै भी इंसान के रूप में कभी कभी बहुत मतलबी रहा हूं, पर मै अब अपना कुछ हिस्सा प्रकृति को दूं।
इस आशा के साथ फिर अगले विचार के साथ आता हूं। जय हिन्द ।
अच्छी सोच है
ReplyDeleteधन्यवाद्,
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