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प्रकृति के साथ

*प्रकृति के साथ*..👣🐾

चलो एक बात पूछता हूं आज सबसे कि प्रकृति के साथ कौन चलता है  या चलने की कोशिश करते हैं?
🌿🌱🌳🎋🍃🌾🐚🐜🐛

ज्यादातर मान लेंगे कि कोशिश तो करते है पर हो नहीं पाता या हम करते है । 

मेरे कई दोस्त ऐसे भी है जो साल भर में मुश्किल से 30 दिन सुबह सूरज को उगते देखे होंगे ।सुबह के किरण को महसूस किए हो या सुबह के ओस को बिछे देखे हो । 

यकीन मानिए आप चाहे माने या नहीं हम  सबके लिए *आज के समय में ये सबसे जरूरी है ।*
            यकीनन मै भी इस  जॉब में आने के बाद थोड़ी आलस से जिंदगी बिता रहा था, आराम से सोना आराम से 9 बजे तक उठना पर *जीवन में  कभी ना कभी आपको आइना दिख ही जाता है ।* मेरे साथ भी यही हुआ और जल्दी हो गया ।

        कुछ दिन पहले की बात है मै जशपुर तरफ गया था एक आदमी का डोलामाइट खदान के पर्यावरण सम्मति के संबंध में जांच करने  , मै देख ही रहा था पर वो बहुत जल्द बाज़ी में था मै गुस्सा गया कि अरे यार  मै संतुष्ट होकर  ही आगे सोचूंगा तुम जल्दी जल्दी क्यों कर रहे हो !!

वो तो कुछ नहीं बोला पर उसका माइनिंग सुपरवाइजर बताया सर की उनको मुंबई जाना है , इनके १२ वर्ष के बच्चे को कैंसर है उसके इलाज के लिए जाना है ।

मेरा काम तो हो गया पर रास्ते भर यही सोच रहा था कि 12वर्ष का बच्चा ऐसा क्या किया होगा कि उसे कैंसर हो गया... 😕

पता है मुझे जवाब बहुत जल्दी मिल गया। अगले ही दिन मै आजाद हिन्द एक्स. से बिलासपुर आ रहा था ,  मै जहां बैठा था वहां खरसिया से एक फैमिली बैठी , काफी पढ़ी लिखे लग रहे थे । उनके साथ तीन बच्चियां थी दो 5 वर्ष के होंगे और एक 3 के आस पास तीनों धमाचौकड़ी मचा रहे थे ।
 कुछ देर बाद उसके पापा आए और तीनों को ऐपी दे दिए  तीनों खुश , कुछ देर में कुरकुरे ,  चिप्स  ...
रास्ते भर खूब खुश थे सब मै भी उनको देख कर खुश था । जब मै बिलासपुर में उतरा उस टाइम स्टेशन से बाहर आते आते सोच रहा था . ..
क्या ये कोल्ड ड्रिंक या चिप्स बच्चो के एलीमेंटरी कनाल  के लिए सही है ??

बाहर अपने दोस्त को बताया उसका एक जवाब था अरे बच्चे मानते कहा है ,आजकल तो यही चल रहा है !!🙄

हां, ये अजीब है ना ,
आजकल यही चल रहा है .,
जैसे सर्दी में आइसक्रीम, 
गर्मी में चाय,
दोपहर में सोना, 
रात को जगना,
ठंडी में न्यू ईयर, 
और बसंत ऋतु में आलस,
खाने में कोलड्रिंक और 
हाथ धोने के लिए नींबू पानी,

बाते तो बहुत सारी है  जो चल रही है जो की अप्राकृतिक है ,पर दिक्कत ये है कि पढ़े लिखे लोग ऐसा ज्यादा कर रहे है और भुगत भी वहीं रहे है ।*

बच्चो को हार्ट अटैक, कैंसर, बचपन में चस्मे लग जाना, २० वर्ष में  डाइबिटीज के रोगी हो जाना , 30साल के उम्र में बाल गिर जाना, सफेद हो जाना, दांत कमजोर हो जाना,मोटापा और....
और बहुत सारी है कहीं ना कहीं  *हम ना बाजारवाद के चक्कर में पड़ कर अपनी ही लाइफ बर्बाद कर रहे है ।

 मेरा आग्रह है कि प्रकृति के साथ चलिए, आपको दिखे ना दिखे , लगे ना लगे , हम बिल्कुल उनसे जुड़े है, वो  अवतार फिल्म याद है उस तरह से प्रत्यक्ष तो नहीं पर जुड़े तो  है और हम ही उससे लगातार दूर जा रहे है ।

प्रकृति ने आपको हर अवस्था में हर दिन हर मौसम में जीने की राह दी है , हमेशा मौसम के अनुरूप रहे । 

एक इंसान कीमत ज्यादा हो पर बेमौसम फल ,सब्जी दिखावे के लिए खाने लग जाता है, अरे यही तो सुविधा है मानते है ।
पर ये सही नहीं है देखो कैसे...

गर्मी में जितने भी फल सब्जी होते है वो सभी तभी उपज हो सकते है जब वो गर्मी में लड़ कर जीवित रह सके , मतलब उनमें क्षमता है कि वो गर्मी से लड़ सके । जैसे तरबूज, खरबूज, में भरपूर पानी होता है आम में लू से बचाने की क्षमता होती है ।आम पना मिलता है,अगर उनको हम भरपूर खाते है तो हमको भी फायदा होगा ।

वैसे ही शरदी में टमाटर, भाजी, मटर, गाजर, सेब, अमरूद,  मूनगा, मुली खूब मिलता है ।
मौसमी फल सस्ते भी रहते है , लोग क्या कहेंगे हमको तो महंगा चाहिए । हमे तो गर्मी में भी गोबी खाना है, और सर्दी में आम,  अरे माल में जो मिलता है !!

पूरा पागलपंती है..😅😅

याद है बचपन में घर में एक दिन रोज टमाटर का झोझो, या चटनी बनता था जब टमाटर सस्ता होता था तो । कहीं ना कहीं ये सही ही था जो फल जिस  मौसम का है उसे तब भरपूर खाए । 

सार ये है कि *प्रकृति के साथ चले और अपने बच्चो को भी सिखाएं, हम लोग अभी मजबूत है कही ना कहीं वो बचपन में हमने जो चना मुर्रा , जैसे देसी ड्राई फूड खाए थे, मिट्टी में उलंड उलंद कर खेले थे  ना उनका असर है, है ना ।

 *बच्चो के जिद के कारण उनको ऐसे चीजे खाने ना दे,  जो इसलिए सही है क्यूंकि उसका विज्ञापन आता है टीवी पर , उसको तो बेचना है वो बोलेगा ही कि ये खाओ तो बच्चा इंटेलिजेंट बनेगा नहीं तो नहीं । पहले परखे फिर निर्णय आप ले , ना कि बच्चे ।*
क्यूंकि इतने समझदार होते तो वो बच्चे नहीं होते ।

आधुनिकता के चक्कर में ना पड़े , आप बीमार होंगे तो  आपको पैसे खर्च दूसरी जगह  करना पड़ेगा , फिर 50 हजार देकर नेचुरल थेरेपी कराओगे या  किसी आश्रम वगैरह में जाओगे ।

देखिए 
*अपने दैनिक जीवन में पांच काम अच्छे से सही समय में  करे सोना, उठना, शोच कार्य, नहाना और खाना । इसका फायदा मिलता है अगर ना लगे तो किसी सेना के जवान या किसी स्कूल के अच्छे शिक्षक से मिले आपको फर्क दिख जाएगा ।*

और हां  एक बात कि *ऐसा नहीं है कि ऐसा खानपान और जीवन जीने वाले हमेशा बीमार ही न पड़े और ये भी नहीं है कि बीमारियां सिर्फ इन्हीं कारण से हो सकता है  दूसरे फैक्टर भी है* पर ये प्रमुख कारण है , जो आज के समय में दिखाई दे रहा  है । कुछ लोग कहते है कि विदेश के लोग तो रात भर काम करते है कोई रूटीन नहीं देखते? कितना मेहनत करते है ? 
कितना सक्सेस फूल भी है वो लोग !!


पर आप जानते है जितने भी सक्सेसफुल है उनमें से 80% लोग, सुबह जल्दी उठ जाते है, अरे योगा भी करते है । डेली एक्सरसाइज उनका रूटीन में है ..

  *क्यूंकि वो जानते है जब सेहत  ठीक नहीं रहता तो पैसा, सम्मान , परिवार, सुख, प्यार कोई मायने नहीं रखते ।*



 मुझे बहुत दिनों से लग रहा था इस पर कुछ लिखना चाहिए, तो आप सबके साथ भी विचार शेयर किया हूं ।मै भी प्रयासरत हूं,   बाकी आप सब समझदार हो ।


और हां 
*प्रकृति के साथ चलना मतलब प्रकृति नाम के लड़की के साथ चलना नहीं होता ठीक है.., वरना में तो उससे शादी कर लेता अगर वो हां बोलती तो*।
😄😄

Hav a good day🐾..🐢

#my experiennce

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