कुछ दिन पहले मैंने एक आर्टिकल पढ़ा कि खुशी कि असली एहसास क्या है उस बारे में । उसके पढ़ते पढ़ते मुझे ये कहानी याद आई कि खुशियां असल में होती कहा है और हम ढूंढते कहा है । चलिए शुतुरमुर्ग के बारे में एक बात बताता हूं , असल में होता ऐसा है कि कहते है जब शुतुरमुर्ग के पीछे कोई शिकारी पड़ जाता है तो वो भागने के बजाय अपना सिर रेत में घुसा देता है और उसको लगता है कि सब तरफ अंधेरा छा गया अब वो सुरुक्षित है । *हैं ना ये बेवकूफी वाली बात* पर पता है कहीं ना कहीं हम लोग भी ऐसे ही है । हम अपनी खुशियां उन चीज़ों में खोजते रहते है जो हमारे आसपास सब अच्छा दिखाता है जबकि असल में ऐसा नहीं होता है । मैंने देखा कि एक लड़का आज पार्टी करता है जबकि पता है कि उसका कल पेपर है, पूछने पर भाई का जन्मदिन बार बार नहीं आता ,यही है शुतुरमुर्ग वाली खुशी पेपर बिगड़ने के बाद एहसास होता है असली खुशी कहा है , क्यूंकि कई बार जिसका बर्थडे था वो पास हो जाए , यकीन मानिए बीएससी 2nd ईयर में ऐसा देखा है मैंने । किसी ने उस टाइम कहा मुझे अरे यार कस्ती को तूफानों में निकलने का अलग ही ...
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