Skip to main content

क्या बुरे चीजों से सीखना समय का सदुपयोग है ??



"बुरी खबर ये है कि समय उड़ता है ।
 अच्छी खबर यह है कि आप ही इसके पायलट है । 
- माईकल आल्थसुलर

मै बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं ,जबकि लॉक डाउन में  मेरे पास काफी समय था । हुआ यूं कि किसी दिन किसी ने मुझसे कहा कि  ये मोटिवेशनल वैगरह से कुछ नहीं होता , जिसको जो करना रहता है वहीं करता है ।

मै सोच में पड़ गया कि क्या सच में ऐसा होता है, मै इसी का उत्तर ढूंढने लगा  !! खैर मैंने थोड़ा विराम लेकर कुछ नया अपनी कहानी लिखने लगा । अचानक एक दिन उससे फोन में बात हुई बातें करते हुए उसने अचानक एक जगह कहा की यार तेरा एक आर्टिकल पढ़ा था बहुत पहले वो मुझे इस समय काम आया ।

तभी ख्याल आया कि ऐसा ही होता है ,, अच्छी चीजें कहीं ना कहीं प्रभावित करती हैं,, नहीं तो बुरी चीजें प्रभावित करने लग जाते है । क्योंकि दिमाग एक खाली उर्वर भूमि की तरह ही  है जिसमें अगर उसमे पुष्प, औषधि, फलदार, सुंदर पौधे ना लगाएं तो खरपतवार पैदा हो ही जाती हैं । कहते भी हैं खाली दिमाग शैतान का घर अगर कुछ अच्छा या रचनात्मक नहीं कर रहे हो तो कुछ शरारत  करने लग जाता है ।
          अच्छा देखे अच्छा महसूस होता हैं खुद के लिए और आप अच्छा भी करते हैं । इस लॉक डाउन  में मैंने दो शोज देखे पहला मिर्ज़ापुर दूसरा  पंचायत ..  दोनों अच्छी है, पर कोटा फैक्ट्री और पंचायत देख कर खुद पर विश्वास और संघर्ष करने की इच्छा बढ़ गई लगा मै भी मुसीबत का सामना कर सकता हूं , मिर्ज़ापुर को भी बहुत अच्छा बनाया गया है उस शहर की पृष्भूमि पर कहानी,  पर मै उसे नहीं देखता तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता ,और हां पंचायत देखा तो बहुत फर्क पड़ा  , यही तो अंतर है ,, ।
यकीनन ये तीनों बहुत अच्छे बने है, पर अच्छे चीजें देखने से आपके अंदर भी एक ऊर्जा का अहसास होता है । समय का सदुपयोग करते हैं, तो अच्छे चीजें देखने में वक़्त जाया करे वरना वो दुरुपयोग ही है । हो सकता है आपको हमेशा अच्छी चीज ना मिले देखने को,, पर उसे अपने कीमती समय में देखना सही नहीं । भले ही वो कितना शुकून दे तुमको, वैसे में तो गंदी मूवी और भी अच्छा अहसास करा सकती है,,, डोपामिन के कारण !!  पर उसे देख कर आपका विचार दूषित ही होगा ।

क्यूंकि देखने के लिए अच्छी और बुरे चीजें बहुत है , हमारे आसपास  । कुछ कहेंगे कि बुरा कैसा होता है इसे जानने के लिए उसे देखना भी जरूरी है , हां ये कुछ हद्द तक सही है पर उसी  तरह से देखना कहीं ना कहीं हमारे विचार को बदल देता  है उसे बुरा बना सकता है ।

हम कई बार ऐसे अच्छे विचार, व्यवहार और रचनाओं को देख नहीं पाते क्योंकि हमारा दिमाग उस समय कई फालतू विचार के पीछे पड़ा रहता है जबकि वो जरूरी नहीं होता ।


तो आइए कोशिश करे , कुछ अच्छी चीजें पहले देखे फिर, ज्यादा देखे, फिर समय मिले तो कुछ रचनात्मक करे,, बुरा देखना उतना भी जरूरी नहीं ।

.. है ना
🙂

..🐢

Comments

Popular posts from this blog

शुतुरमुर्ग की खुशी जैसी तो नहीं है आपकी खुशी ??

कुछ दिन पहले मैंने एक आर्टिकल पढ़ा कि खुशी कि असली एहसास क्या है उस बारे में । उसके पढ़ते पढ़ते मुझे ये कहानी याद आई कि खुशियां असल में होती कहा है और हम ढूंढते कहा है । चलिए शुतुरमुर्ग के बारे में एक बात बताता हूं , असल में होता ऐसा है कि कहते है जब शुतुरमुर्ग के पीछे कोई शिकारी पड़ जाता है तो वो भागने के बजाय  अपना सिर रेत में घुसा देता है  और उसको लगता है कि सब तरफ अंधेरा छा गया अब वो सुरुक्षित है । *हैं ना ये बेवकूफी वाली बात*  पर पता है कहीं ना कहीं हम लोग भी ऐसे ही है । हम अपनी खुशियां उन चीज़ों में खोजते रहते है जो हमारे आसपास सब अच्छा दिखाता है जबकि असल में ऐसा नहीं होता  है । मैंने देखा कि एक लड़का आज पार्टी करता है जबकि पता है कि उसका कल पेपर है, पूछने पर भाई का जन्मदिन बार बार नहीं आता  ,यही है शुतुरमुर्ग वाली खुशी पेपर बिगड़ने के बाद एहसास होता है असली खुशी कहा है , क्यूंकि कई बार जिसका बर्थडे था वो पास हो जाए , यकीन मानिए बीएससी 2nd ईयर में ऐसा देखा है मैंने । किसी ने उस टाइम कहा मुझे अरे यार कस्ती को तूफानों में निकलने का अलग ही ...

Risk

Risk एक बार किसी ने एक किसान से पूछा - क्या तुमने इस मौसम में धान की फसल बोई है ?? किसान ने कहा - नहीं मुझे बारिश नहीं होने का अंदेशा था ! तो क्या मक्के बोए उस आदमी ने पूछा ? उसने कहा मुझे डर था कि कीड़े  मकोड़े खा लेंगे !! आदमी ने पूछा - आखिर तुमने बोया क्या है ?? किसान ने कहा : कुछ नहीं *मै खतरे नहीं उठाना चाहता था !!* 😢 कई लोगो में  फैसला ना लें पाने की आदत बन जाती हैं  और कई बार फैसला ना लेने के कारण कई अवसरों से हाथ धो बैठते हैं । *हमको ना...* 🌿हंसने में बेवकूफ समझे जाने  डर है, 🌿रोने में जज्बाती समझे जाने का डर है, 🌿सीखने में सफल ना होने का डर, 🌿प्रेम करने में बदले में प्रेम  मिलने का डर, डर तो बहुत सारे है पर आपको तो रिस्क उठाने ही पड़ेंगे, *रिस्क लेने और बेवकूफी में फर्क है*😁 खतरे उठाने का मतलब बेवकूफी और गैरजिम्मेदारी बरतना नहीं होता है। एक उदाहरण देता हूं मेरी एक दोस्त की शादी थी रात को पार्टी वगैरह  होते 11:45 के आसपास हो गया था । जब घर जाने के लिए हुए तो बाकी सब तो दुर्ग वाले थे लेकिन एक दोस्त जो भिलाई की थी वो ज़िद करने ल...

करना है तो करना है

मै हमेशा  कहता रहता हूं कि किन आदतों को अपनाकर सफल हो सकते है , किस आदत को छोड़कर हम बेहतर हो सकते है, ये  सफल होने वाला व्यक्ति अच्छे से जानता है । परन्तु सच्चाई ये है कि 100 में से 90 ऐसे लोग जो जानते है कैसे सफल हो सकते है अपने किसी कार्य में सफल नहीं होते है । तो असल बात ये है कि जानने से कुछ नहीं होता कि सफलता कैसे मिलती है, क्यूं मिलती है । जो लोग काम करते है रिजल्ट देते है वो ही सफल माना जाता है,,  तो मुद्दा अब ये आता है सबके साथ  कि मै सोचता तो  हूं कि ये करूं पर शुरू नहीं हो पाता है , यह एक सामान्य सी बात है जो हम सबके साथ होता है कि हम करना तो बहुत कुछ चाहते है पर असल में कर नहीं पाते हैं और कुछ लोग चाहते है वो आपके देखते ही देखते पा लेते है । जैसे मुझे एक किताब पढ़ना है डिसाइड करते है, कि इसे इतने दिनों में पूरा कर लूंगा पर कुछ काम आ जाता या थोड़ा आराम करलू, या थोड़ा टीवी देख लूं या उस किताब को छोड़ के कोई और किताब पढ़ने  लग जाते है  ।  ज़िन्दगी में सफलता ऐसे हासिल नहीं कि जाती है , तो आखिर क्या बात है जो हर सफल व्यक्ति में होता है जो उ...